हाट बाजार में बिक रहा केंड, लेकिन जंगलों में घट रही इसकी मौजूदगी

सौरभ कुमार, जादूगोड़ा

गर्मियों के मौसम में आम की मिठास की चर्चा हर जगह होती है, लेकिन झारखंड के जंगलों में एक और देसी फल है, जिसकी अपनी अलग पहचान और स्वाद है। यह फल है केंड (केंदू)। पकने के बाद इसका स्वाद इतना मीठा होता है कि एक बार खाने वाला इसे लंबे समय तक याद रखता है। लेकिन अफसोस की बात है कि जंगलों की शान माने जाने वाले यह पेड़ अब धीरे-धीरे जंगलों से गायब होते जा रहे हैं। केंड का पेड़ प्राकृतिक रूप से जंगलों में उगता है। ग्रामीण इलाकों में इसकी जड़ों और लकड़ियों का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। जब इसकी लकड़ी जलती है तो उसमें से नीली चमकदार लपटें निकलती हैं और चटकने की आवाज आती है। यही कारण है कि मकर संक्रांति के आसपास गांवों के बच्चे मनोरंजन के लिए कई बार केंड के पेड़ों को काटकर जला देते हैं। वर्षों से चल रही यह परंपरा अब इस बहुमूल्य वृक्ष के अस्तित्व पर खतरा बनती जा रही है।स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जंगलों में केंड के पेड़ बड़ी संख्या में दिखाई देते थे, लेकिन अब इनकी संख्या लगातार घट रही है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस वृक्ष का प्राकृतिक पुनर्जनन भी आसान नहीं है। बीजों से नए पौधे बहुत कम उग पाते हैं, जिससे इसकी संख्या बढ़ना मुश्किल होता जा रहा है। केंड भले ही जंगलों से कम होता जा रहा हो, लेकिन इसकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है। जादूगोड़ा कॉलोनी क्षेत्र में लगने वाले साप्ताहिक हाट में महिलाएं और बच्चे केंड फल बेचते हुए नजर आते हैं। वहीं जमशेदपुर से जादूगोड़ा आने वाले मार्ग पर झरिया क्षेत्र के आसपास सड़क किनारे भी ग्रामीण इसे बेचते दिखाई देते हैं। राहगीर रुककर इस देसी फल का स्वाद लेना नहीं भूलते।

पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि यदि जंगलमहल क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को केंड जैसे देसी फलदार वृक्षों के महत्व और संरक्षण के बारे में पढ़ाया जाए, तो आने वाली पीढ़ियां इनके प्रति जागरूक होंगी। वृक्षारोपण और संरक्षण की छोटी-छोटी पहलें इस दुर्लभ होते जा रहे वृक्ष को नया जीवन दे सकती हैं। केंड सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि जंगल और आदिवासी संस्कृति की पहचान है। इसके साथ ग्रामीणों की स्मृतियां, परंपराएं और प्रकृति से जुड़ा जीवन भी जुड़ा हुआ है। यदि समय रहते इसके संरक्षण की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वह दिन दूर नहीं जब यह मीठा देसी फल केवल बुजुर्गों की यादों और किताबों के पन्नों तक सिमटकर रह जाएगा। केंड को बचाना सिर्फ एक पेड़ को बचाना नहीं, बल्कि जंगल की उस विरासत को बचाना है, जो पीढ़ियों से हमारी पहचान रही है।

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