हर पत्थर में बसते हैं भोलेनाथ, कोकदा का श्री श्री महाकालेश्वर मंदिर (साधु डेरा)

सौरभ कुमार, जादूगोड़ा

पोटका प्रखंड के कोकदा गांव में आसनबनी रेलवे स्टेशन के पश्चिम केबिन से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित श्री श्री महाकालेश्वर मंदिर (साधु डेरा) आज श्रद्धा, आस्था और चमत्कार का अद्भुत संगम बन चुका है। सावन का पावन महीना शुरू होते ही यहां हर दिन दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करने पहुंच रहे हैं। “हर-हर महादेव” और “बोल बम” के जयघोष से पूरा मंदिर परिसर शिवमय हो उठता है। प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह मंदिर भक्तों को आध्यात्मिक शांति का अद्भुत अनुभव कराता है। लगभग साढ़े तीन वर्ष पूर्व वर्तमान स्वरूप में स्थापित इस मंदिर की पहचान केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोकआस्था और चमत्कार से जुड़ी मान्यताओं के कारण भी है। स्थानीय लोगों के अनुसार इस स्थान का इतिहास करीब 350 वर्ष पुराना है।

कहा जाता है कि उस समय यह पूरा इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था और ग्रामीण यहां अपने मवेशियों को चराने लाते थे। लोककथाओं के अनुसार चरवाहों ने एक विचित्र घटना देखी। उनकी गायें चरने के बाद घर लौटतीं, लेकिन दूध नहीं देती थीं। इस रहस्य ने ग्रामीणों को चिंता में डाल दिया। उन्होंने गायों पर नजर रखनी शुरू की। एक दिन लोगों ने देखा कि गायें जंगल के बीच स्थित एक पत्थर के पास स्वयं जाकर खड़ी हो जाती हैं और उनके थनों से बिना किसी के छुए स्वतः दूध निकलकर उस पत्थर पर गिरने लगता है। यह दृश्य देखकर सभी ग्रामीण आश्चर्यचकित रह गए। बताया जाता है कि जिज्ञासावश कुछ लोगों ने कुल्हाड़ी से उस पत्थर पर प्रहार किया, जिससे उसमें दरार पड़ गई। उसी रात एक चरवाहे को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन देकर बताया कि जिसे लोग साधारण पत्थर समझ रहे हैं, वह कोई सामान्य पत्थर नहीं, बल्कि पाताल से प्रकट हुआ स्वयंभू शिवलिंग है। इसके बाद ग्रामीणों ने उस स्थान पर विधिवत पूजा-अर्चना शुरू की और बाद में सामूहिक सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया। स्थानीय परंपरा के अनुसार इस अद्भुत घटना के साक्षी स्वर्गीय खगेन चंद्र दास, उनके पुत्र स्वर्गीय तुलसी चंद्र दास, उनके पुत्र स्वर्गीय फकीर चंद्र दास तथा बाद में स्वर्गीय कालिदास दास का परिवार रहा। वर्तमान में उनके वंशज अशोक दास और शंकर दास इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि शिवलिंग पर कुल्हाड़ी के प्रहार से बनी दरार आज भी स्पष्ट दिखाई देती है, जो इस लोककथा की जीवंत पहचान मानी जाती है।
समय के साथ इस स्थान की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। अनेक साधु-संत यहां साधना के लिए आने लगे और यहीं निवास करने लगे। धीरे-धीरे यह क्षेत्र “साधु डेरा” के नाम से प्रसिद्ध हो गया। आज भी यहां आने वाले श्रद्धालु इस स्थान की आध्यात्मिक ऊर्जा को विशेष रूप से महसूस करते हैं। मंदिर परिसर में भगवान महादेव के साथ माता पार्वती की भी विधिवत स्थापना की गई है। यहां आने वाले श्रद्धालु पहले गुप्त गंगा के जल से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और फिर पूजा-अर्चना करते हैं। स्थानीय श्रद्धालु अजय सिंह बताते हैं कि भगवान महादेव की कृपा से मंदिर परिसर में मां गंगा का उद्गम माना जाता है। यहां स्थित गुप्त गंगा का जल कभी नहीं सूखता। पूरे वर्ष इसी पवित्र जल से श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं, जो इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है। कुदरा नदी के समीप समतल भूमि पर स्थित यह मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। चारों ओर हरियाली, शांत वातावरण और पक्षियों की मधुर आवाज श्रद्धालुओं के मन को अद्भुत सुकून प्रदान करती है। यहां पहुंचते ही भक्त सांसारिक भागदौड़ से दूर आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं।
स्थानीय श्रद्धालु महेंद्र कुमार कहते हैं कि यह केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और अटूट विश्वास का केंद्र है। उनका कहना है कि सच्चे मन से जो भी भक्त बाबा महाकालेश्वर के दरबार में अपनी मनोकामना लेकर आता है, भगवान शिव उसकी हर प्रार्थना अवश्य सुनते हैं।
सावन के पूरे महीने मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना, रुद्राभिषेक और जलाभिषेक का आयोजन होता है। झारखंड ही नहीं, आसपास के कई क्षेत्रों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। सुबह से देर शाम तक “हर-हर महादेव” और “बोल बम” के जयघोष से पूरा परिसर गूंजता रहता है। श्रद्धा, विश्वास, चमत्कार और प्रकृति की अनुपम छटा से परिपूर्ण श्री श्री महाकालेश्वर मंदिर (साधु डेरा) आज सावन में शिवभक्तों की आस्था का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। यहां आने वाला हर श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ की दिव्य अनुभूति लेकर लौटता है।

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