देवस्नान से रथ यात्रा तक… महापर्व का साक्षी बना जादूगोड़ा, जय जगन्नाथ के जयघोष से गूंजा क्षेत्र

सौरभ कुमार, जादूगोड़ा

जादूगोड़ा में कई दिनों से चल रहे सनातन संस्कृति के महापर्व का भव्य शिखर बनकर सामने आई। यूसील कॉलोनी स्थित शिव मंदिर परिसर से भगवान श्रीजगन्नाथ, भगवान बलभद्र एवं देवी सुभद्रा की भव्य रथ यात्रा हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में श्रद्धा और उल्लास के साथ निकाली गई। जैसे ही भगवान का रथ आगे बढ़ा, पूरा जादूगोड़ा, यूसीआईएल कॉलोनी “जय जगन्नाथ” के गगनभेदी जयघोष, शंखध्वनि, घंटियों की अनुगूंज और हरिनाम संकीर्तन से भक्तिमय हो उठा।

विधिवत पूजा अर्चना के पश्चात श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ भगवान के रथ की रस्सियां थामीं। शिव मंदिर से प्रारंभ हुई रथ यात्रा पारंपरिक मार्ग से होते हुए मौसीबाड़ी के लिए प्रस्थान कर गई। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था। महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों और बच्चों ने बड़ी संख्या में भाग लेकर इस धार्मिक आयोजन को जनआस्था के उत्सव में बदल दिया। मार्ग के दोनों ओर खड़े श्रद्धालु भगवान के दर्शन कर अपने परिवार और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना करते रहे। दरअसल, इस भव्य रथ यात्रा की शुरुआत देवस्नान पूर्णिमा से ही हो गई थी। ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर शिव मंदिर परिसर से ईंटा भट्ठा घाट तक निकली कलश यात्रा में श्रद्धालुओं ने पवित्र जल लाकर भगवान श्रीजगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का महाअभिषेक किया था।

वैदिक मंत्रोच्चार के बीच 108 कलशों के पवित्र जल से हुए दिव्य स्नान के बाद भगवान अनासरा (अनवसर) काल में विराजमान रहे। कई स्थानों पर श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर भगवान का स्वागत किया, वहीं रथ की रस्सी पकड़ने के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा गया। धार्मिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचना सौभाग्य और पुण्य का प्रतीक माना जाता है। रथ यात्रा ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि भगवान जगन्नाथ किसी एक वर्ग के नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के आराध्य हैं। उनके रथ के आगे न कोई ऊंच नीच होती है और न ही किसी प्रकार का भेदभाव। आस्था की यही समानता इस महापर्व की सबसे बड़ी पहचान है। आयोजन समिति और मंदिर प्रबंधन की ओर से पूरे आयोजन को सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न कराया गया।

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