रहस्य, आस्था और प्रकृति का संगम: कपारगादी की माँ रंकिणी धाम

रिपोर्ट, सौरभ कुमार, जादूगोड़ा

पूर्वी सिंहभूम जिले की धरती प्राकृतिक सुंदरता, आदिवासी संस्कृति और प्राचीन आस्था स्थलों के लिए जानी जाती है। इन्हीं ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्थलों में एक नाम कपारगादी स्थित माँ जगत जननी रंकिणी मंदिर का भी है, जो वर्षों से लाखों श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। जादूगोड़ा हाता मुख्य मार्ग पर जादूगोड़ा से लगभग तीन किलोमीटर दूर पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच स्थित यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि रहस्य, लोककथा, प्रकृति और विश्वास का जीवंत प्रतीक माना जाता है। कपारगादी की शांत वादियों में स्थित यह मंदिर पहली नजर में ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।

चारों ओर फैली हरियाली, पहाड़ियों से आती ठंडी हवाएं, पक्षियों की मधुर आवाज और मंदिर परिसर में गूंजती घंटियों की ध्वनि यहां पहुंचने वाले हर व्यक्ति को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति कराती है। यहां पहुंचते ही ऐसा महसूस होता है मानो इंसान शहर की भागदौड़ और तनाव से दूर किसी दिव्य संसार में प्रवेश कर गया हो। सुबह के समय मंदिर परिसर का दृश्य अत्यंत मनमोहक होता है। सूरज की पहली किरण जब पहाड़ियों और मंदिर के शिखर पर पड़ती है, तब पूरा वातावरण भक्ति और शांति से भर उठता है। श्रद्धालु हाथों में पूजा की थाली लेकर मां के दरबार में पहुंचते हैं और “जय मां रंकिणी” के जयकारों से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो जाता है। मंदिर में विराजमान मां रंकिणी का स्वरूप लोगों के बीच गहरी आस्था का विषय बना हुआ है। चांदी की आंखों से सुसज्जित मां का रूप श्रद्धालुओं को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि मां अपने दरबार से किसी भी भक्त को निराश होकर वापस नहीं लौटातीं। यही कारण है कि प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचकर अपने परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और मनोकामना पूर्ति के लिए पूजा-अर्चना करते हैं।

मंगलवार और शनिवार को मंदिर परिसर में विशेष भीड़ देखने को मिलती है। इन दिनों सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं। महिलाएं लाल चुनरी और पूजा सामग्री लेकर मां के दर्शन के लिए पहुंचती हैं, तो युवा और बुजुर्ग भी पूरी श्रद्धा के साथ मां के चरणों में शीश झुकाते हैं। घंटियों, शंखध्वनि और भक्तिमय गीतों से पूरा वातावरण भक्तिरस में डूब जाता है। मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता इसका गर्भगृह है। यहां किसी देवी की भव्य मूर्ति स्थापित नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक शिला यानी पत्थर की पूजा मां रंकिणी के पाषाण स्वरूप के रूप में की जाती है। श्रद्धालु इसी शिला को देवी का साक्षात स्वरूप मानते हैं। वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी लोगों की आस्था को और गहरा करती है। मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, वर्ष 1947 से 1950 के आसपास कपारगादी के स्थानीय निवासी दिनबंधु सिंह को मां रंकिणी ने सपने में दर्शन दिए थे। कहा जाता है कि मां ने उन्हें एक विशेष पत्थर को अपने स्वरूप के रूप में स्थापित कर पूजा-अर्चना शुरू करने का निर्देश दिया। इसके बाद यहां मां की आराधना प्रारंभ हुई और धीरे-धीरे यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए विशाल आस्था केंद्र बन गया। स्थानीय लोगों के बीच यह भी मान्यता प्रचलित है कि मां रंकिणी तीन बहनें थीं। कहा जाता है कि तीनों बहनों के मंदिर अलग-अलग स्थानों पर स्थापित हैं। इनमें जादूगोड़ा के कपारगादी, गालूडीह और घाटशिला स्थित मंदिर प्रमुख माने जाते हैं।

श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां तीनों स्थानों पर अलग-अलग स्वरूप में विराजमान होकर अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। रंकिणी मंदिर का इतिहास रहस्य और लोककथाओं से भी जुड़ा हुआ है। स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, प्राचीन समय में यहां नरबलि की प्रथा प्रचलित थी। कहा जाता है कि वर्ष 1865 के आसपास अंग्रेजों ने इस प्रथा पर रोक लगाई थी। जनजातीय समाज में यह मान्यता थी कि मां रंकिणी स्वयं अपराधियों और पापियों का अंत करती थीं। हालांकि इन कथाओं का कोई आधिकारिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन आज भी यह बातें लोगों के बीच रहस्य और रोमांच का विषय बनी हुई हैं। कहा जाता है कि धालभूमगढ़ के राजा जगन्नाथ धाल ने भी इस मंदिर के विकास और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वहीं एक अन्य लोककथा के अनुसार, एक आदिवासी व्यक्ति ने जंगल में आभूषणों से सजी एक छोटी बालिका को देखा था, जो अचानक रहस्यमय तरीके से गायब हो गई। उसी रात देवी ने सपने में दर्शन देकर मंदिर निर्माण और पूजा शुरू करने का आदेश दिया। मंदिर परिसर के सामने स्थित पहाड़ी पर बजरंगबली की विशाल प्रतिमा श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का बड़ा केंद्र है। श्रद्धालु जब पहाड़ी पर चढ़ते हैं और ऊपर से नीचे का दृश्य देखते हैं, तो प्रकृति की अनुपम सुंदरता उन्हें मंत्रमुग्ध कर देती है। दूर-दूर तक फैली हरियाली, पहाड़ियों की श्रृंखलाएं और शांत वातावरण किसी प्राकृतिक पर्यटन स्थल जैसा अनुभव कराते हैं। बरसात के मौसम में यहां की सुंदरता और भी बढ़ जाती है। पहाड़ियों पर बिछी हरियाली, बादलों से ढका आसमान और ठंडी हवाएं यहां आने वालों को ऐसा एहसास कराती हैं मानो वे किसी चित्रकार की बनाई खूबसूरत तस्वीर के बीच खड़े हों। कई लोग केवल दर्शन के लिए ही नहीं, बल्कि प्रकृति की गोद में कुछ पल सुकून बिताने के लिए भी यहां पहुंचते हैं। मंदिर में वर्षों से एक विशेष परंपरा निभाई जा रही है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने की उम्मीद में लाल कपड़े में सुपाड़ी, नारियल और अक्षत बांधकर मंदिर परिसर में टांगते हैं। मान्यता है कि जब मां भक्तों की इच्छा पूरी कर देती हैं, तो वह बंधन अपने आप खुल जाता है। यही विश्वास श्रद्धालुओं को बार-बार मां के दरबार तक खींच लाता है। यहां के पुजारी परंपरागत रूप से सहाड़ा गांव के भूमिज समाज से होते हैं। वर्तमान में मंदिर के मुख्य पुजारी अनिल सिंह वर्षों से मां की सेवा और पूजा-अर्चना कर रहे हैं। बताया जाता है कि वर्तमान मंदिर का निर्माण लगभग वर्ष 1950 के आसपास हुआ था, जबकि मंदिर ट्रस्ट का गठन वर्ष 1954 में किया गया। समय के साथ मंदिर परिसर में कई विकास कार्य हुए, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था आज भी पहले जैसी ही अटूट बनी हुई है। आज कपारगादी स्थित मां रंकिणी मंदिर केवल पूर्वी सिंहभूम ही नहीं, बल्कि झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के हजारों श्रद्धालुओं के लिए बड़ा आध्यात्मिक केंद्र बन चुका है। यहां आने वाले भक्तों का कहना है कि मां के दरबार में पहुंचने के बाद उन्हें मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आत्मिक सुकून का अनुभव होता है। अगर आप भी प्रकृति की गोद में कुछ पल सुकून, आध्यात्मिक शांति और रहस्यमयी इतिहास को करीब से महसूस करना चाहते हैं, तो कपारगादी स्थित मां रंकिणी का दरबार आपका इंतजार कर रहा है। यहां की हरियाली, पहाड़, लोककथाएं, भक्तिमय वातावरण और मां का आशीर्वाद हर आने वाले व्यक्ति के मन में ऐसी छाप छोड़ जाता है, जिसे शब्दों में पूरी तरह बयां कर पाना आसान नहीं। शायद यही वजह है कि जो एक बार मां रंकिणी के दरबार में आता है, वह दोबारा फिर यहां खिंचा चला आता है।

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