सौरभ कुमार | जादूगोड़ा
देश की सीमाओं पर तैनात जवानों को लोग अक्सर फौलादी हौसलों वाला इंसान मानते हैं। ऐसा लगता है जैसे दर्द, आंसू और टूटन उनसे कोसों दूर हों। लेकिन जब वही जवान अपनी मां को तड़पते हुए देखता है, तब उसकी वर्दी नहीं, उसका दिल बोलता है। कानपुर से सामने आई एक घटना ने न सिर्फ सिस्टम पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि हर संवेदनशील इंसान की आंखें भी नम कर दी हैं।

आईटीबीपी की 32वीं बटालियन में तैनात जवान विकास सिंह इन दिनों किसी दुश्मन से नहीं, बल्कि न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके हाथ में हथियार नहीं था, बल्कि एक थर्मोकॉल बॉक्स में रखा उनकी मां का कटा हुआ हाथ था। वही हाथ जिसने बचपन में उन्हें उंगली पकड़कर चलना सिखाया, भूखे रहकर बेटे को खिलाया और हर मुश्किल में सिर पर स्नेह रखा।

मां को बचाने की जद्दोजहद
फतेहपुर जिले के खागा निवासी विकास सिंह 13 मई 2026 की रात अपनी 56 वर्षीय मां निर्मला देवी को गंभीर हालत में लेकर अस्पताल पहुंचे। रास्ते में जाम, एम्बुलेंस में कम होती ऑक्सीजन और मां की बिगड़ती सांसों के बीच विकास की एक ही कोशिश थी—किसी तरह मां की जान बच जाए।
जल्दबाजी में उन्हें कानपुर के टाटमिल चौराहा स्थित कृष्णा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने हालत गंभीर बताई और उम्मीद बेहद कम जताई। पूरी रात विकास अस्पताल के बाहर बैठकर मां की जिंदगी की दुआ मांगते रहे।

सुबह परिवार को लगा कि खतरा टल गया है, लेकिन असली दर्द अभी बाकी था।
इलाज के दौरान बिगड़ी हालत
परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में लगाए गए इंजेक्शन या कैनुला के बाद निर्मला देवी के दाहिने हाथ में संक्रमण फैल गया। धीरे-धीरे हाथ काला पड़ने लगा, सूजन और दर्द बढ़ता गया। विकास ने कई बार अस्पताल प्रबंधन को स्थिति बताई, लेकिन हर बार सामान्य ड्रेसिंग की बात कहकर मामला टाल दिया गया।
जब हालत ज्यादा बिगड़ी तो परिवार उन्हें दूसरे अस्पताल लेकर पहुंचा। वहां डॉक्टरों ने बताया कि हाथ की नसों में खून का बहाव पूरी तरह रुक चुका है और संक्रमण तेजी से फैल चुका है। डॉक्टरों ने काफी कोशिश की, लेकिन आखिरकार 17 मई को निर्मला देवी की जान बचाने के लिए उनका दाहिना हाथ काटना पड़ा।
“यही हाथ था जिसने मुझे खाना खिलाया था”
एक मां का हाथ कटना सिर्फ शरीर का अंग खोना नहीं होता, वह पूरे परिवार की यादों का टूट जाना होता है। उसी हाथ से मां ने बेटे का माथा सहलाया था, रोटियां सेंकी थीं और हर दर्द को अपने आंचल में छिपाया था। अब वही हाथ एक बॉक्स में बंद था।

विकास सिंह न्याय की उम्मीद लेकर थाने, स्वास्थ्य विभाग और अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगाते रहे। लेकिन हर जगह उन्हें सिर्फ जांच, प्रक्रिया और इंतजार मिला।
आखिरकार जब सुनवाई नहीं हुई, तो वह अपनी मां का कटा हाथ लेकर पुलिस कमिश्नरेट पहुंच गए। अधिकारियों के सामने बॉक्स रखते हुए उनकी आवाज भर्रा गई—
> “यही हाथ था जिसने मुझे बचपन से खाना खिलाया… आज मैं इसे लेकर इंसाफ मांग रहा हूं।
देश के दुश्मनों से लड़ सकता हूं, लेकिन अपनी मां के लिए न्याय नहीं दिला पा रहा हूं।”
यह सुनकर वहां मौजूद लोग भी स्तब्ध रह गए। एक जवान की आंखों से बहते आंसू मानो पूरे सिस्टम से सवाल कर रहे थे।
अब जांच के आदेश
मामला बढ़ने के बाद 23 मई को आईटीबीपी के करीब 50 जवान और अधिकारी कानपुर पुलिस कमिश्नरेट पहुंचे। सभी अनुशासन में थे, लेकिन साथी के दर्द और आक्रोश को उनके चेहरे साफ बयां कर रहे थे। उन्होंने निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग की।
इसके बाद पुलिस कमिश्नर ने मामले को गंभीर मानते हुए संयुक्त जांच समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं।
एक सवाल बाकी है…
यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस दर्द की कहानी है जिसमें एक बेटा अपनी मां का कटा हाथ लेकर न्याय की गुहार लगाने को मजबूर हो गया। सवाल सिर्फ मेडिकल लापरवाही का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का भी है जहां इंसाफ पाने के लिए इंसान को अपने जख्मों का सबूत हाथों में लेकर भटकना पड़े।
शायद इस कहानी को पढ़ने के बाद हर इंसान अपनी मां के हाथों को एक बार जरूर महसूस करेगा।










