सौरभ कुमार, जादूगोड़ा
जादूगोड़ा इन दिनों भीषण गर्मी की आग में झुलस रहा है। सुबह होते ही सूरज की तपिश लोगों को घरों में कैद कर देने पर मजबूर कर रही है। दोपहर में सड़कें सुनसान पड़ जा रही हैं। बाजारों की रौनक गायब है। मजदूरों, ऑटो चालकों, किसानों और राहगीरों का जीवन सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है। लोगों का कहना है कि अब गर्मी पहले जैसी नहीं रही, बल्कि हर साल पिछले साल से ज्यादा खतरनाक होती जा रही है। बैंकों में भी ग्राहक बहुत कम नजर आ रहे हैं। लेकिन यह केवल जादूगोड़ा की कहानी नहीं है। यह पूरे पृथ्वी की पीड़ा है। यह उस बदलते वायुमंडल की चेतावनी है, जिसे इंसान अपनी ही हाथों से बिगाड़ रहा है। आज विकास के नाम पर बड़े बड़े पेड़ काटे जा रहे हैं। कहीं सड़क चौड़ीकरण के लिए, कहीं नई बिल्डिंग के लिए, तो कहीं फैक्ट्री और बाजार के विस्तार के लिए वर्षों पुराने विशाल पेड़ों को कुछ ही घंटों में धराशायी कर दिया जाता है। ऐसे पेड़, जिन्होंने दशकों तक लोगों को छाया दी, हवा दी, बारिश को संतुलित रखा और धरती को ठंडा बनाए रखा। उनके बदले में छोटे छोटे पौधे लगाकर जिम्मेदारी पूरी होने का दावा कर दिया जाता है। लेकिन क्या 25-30 साल पुराने एक विशाल पेड़ की भरपाई एक छोटा पौधा कर सकता है? क्या वह तुरंत उतनी ऑक्सीजन देगा, उतनी ठंडक देगा, उतना पर्यावरण बचा पाएगा? जवाब साफ है नहीं। आज हर घर में एसी, कूलर और पंखों की संख्या बढ़ रही है। लोग अपने कमरों को ठंडा करने में लगे हैं, लेकिन कोई यह नहीं सोच रहा कि बाहर की धरती कितनी गर्म होती जा रही है। मशीनों से मिलने वाली राहत अस्थायी है, लेकिन उससे निकलने वाली गर्म हवा और बढ़ता बिजली उपभोग पर्यावरण को और अधिक नुकसान पहुंचा रहा है। यदि इतिहास के पन्ने पलटकर देखा जाए तो पांच दस वर्ष पहले इतनी भयावह गर्मी नहीं पड़ती थी। तापमान बढ़ा है, मौसम का संतुलन बिगड़ा है, बारिश का समय बदल गया है और प्रकृति का व्यवहार असामान्य होता जा रहा है। कभी अचानक तेज बारिश, कभी सूखा, कभी आंधी, कभी आग जैसी गर्मी यह सब संकेत हैं कि जादूगोड़ा के साथ साथ पूरा का पूरा पृथ्वी खतरे में है। सबसे दुखद बात यह है कि लोग इस संकट को समझने के बावजूद गंभीर नहीं हैं। मकान बन रहे हैं, दुकानें बन रही हैं, सड़कें बन रही हैं, लेकिन पेड़ नहीं बच रहे। विकास जरूरी है, लेकिन क्या ऐसा विकास सही है जो इंसानों के लिए सांस लेना तक मुश्किल कर दे? आज जादूगोड़ा की तपती सड़कें एक सवाल पूछ रही हैं जादूगोड़ा के लोगों से क्या आने वाली पीढ़ियों को हम रहने लायक धरती दे पाएंगे? यदि अभी भी पेड़ों की कटाई नहीं रुकी, यदि पर्यावरण संरक्षण को केवल कागजों और भाषणों तक सीमित रखा गया, तो आने वाले समय में हालात और भयावह हो सकते हैं। पानी की कमी, असहनीय गर्मी, बीमारियों में बढ़ोतरी और जीवन संकट का रूप ले सकता है। यह समय केवल चिंता करने का नहीं, बल्कि जागने का है।
एक पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं होता, वह धरती की सांस होता है। यदि इंसान ने अब भी प्रकृति को नहीं बचाया, तो आने वाले वर्षों में शायद एसी और कूलर भी इस आग जैसी गर्मी से राहत नहीं दे पाएंगे। तब इंसान समझेगा कि उसने विकास की दौड़ में सबसे बड़ी कीमत अपनी ही पृथ्वी को खोकर चुकाई है।










