रिपोर्ट, सुरेंद्र सिंह चौहान।
योगी सरकार के मिशन से मिली उड़ान, जूट बैग और दोना-पत्तल कारोबार ने शीला दीदी को बनाया आत्मनिर्भर
-सिलाई मशीन से शुरू सफर, आज 8 से 10 लाख रुपये का कारोबार; 40 से 50 महिलाओं को मिला रोजगार
-हर महीने 25 से 30 हजार रुपये की बचत, शीला दीदी की मेहनत बनी गांव की महिलाओं के लिए प्रेरणा
-चारदीवारी से निकलीं तो लिखी सफलता की नई कहानी, ‘लखपति दीदी’ अभियान की मिसाल बनीं शीला
बाराबंकी,14 सितम्बर। जिले के देवा ब्लॉक के मुजफ्फर मऊ गांव की शीला देवी आज शीला दीदी समूह सखी के नाम से जानी जाती हैं। कुछ साल पहले तक वे सिर्फ एक आम गृहिणी थीं, जिनकी पहचान घर की चारदीवारी तक सीमित थी। आर्थिक रूप से पूरी तरह दूसरों पर निर्भर, बिना किसी अपनी पहचान के, लेकिन वर्ष 2018 में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तहत ‘रविदास स्वयं सहायता समूह’ से जुड़ने के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। आज वे न सिर्फ खुद आत्मनिर्भर हैं, बल्कि सैकड़ों महिलाओं के लिए संबल और प्रेरणा बन चुकी हैं।
मा0 मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (यूपीएसआरएलएम) ने ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने का जो अभियान चलाया है। शीला दीदी उसकी जीवंत मिसाल हैं। सरकार ने स्वयं सहायता समूहों को सिर्फ बचत के मंच तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें आर्थिक स्वावलंबन, कौशल विकास, बैंक लिंकेज और बाजार पहुंच का मजबूत आधार दिया। प्रदेश में करोड़ों महिलाओं को समूहों से जोड़कर ‘लखपति दीदी’ बनाने का लक्ष्य रखा गया है। शीला दीदी इसी मिशन की सफलता की कहानी हैं।
2018 से पहले शीला दीदी का जीवन था सामान्य
2018 से पहले शीला दीदी का जीवन सामान्य गांव की महिलाओं जैसा ही था। घर संभालना, पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाना, यही उनकी दुनिया थी। आर्थिक मजबूती की चाह तो थी, लेकिन सही मार्गदर्शन और साधन का अभाव था। उसी साल उन्होंने रविदास स्वयं सहायता समूह की सदस्यता ली। समूह में उनकी कर्मठता और नेतृत्व क्षमता जल्द ही सामने आई। उन्हें समूह सखी और रविदास आजीविका संगठन की अध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया।
सिलाई मशीन खरीद जूट बैग निर्माण का शुरू किया काम
शीला को समूह से मिले सामुदायिक निवेश निधि (सीआईएफ) की मदद से उन्होंने पहली बार आधुनिक सिलाई मशीन खरीदी और जूट बैग निर्माण का काम शुरू किया। पर्यावरण-अनुकूल जूट बैग की स्थानीय बाजार और मेलों में मांग बढ़ रही थी। गुणवत्ता और मेहनत के दम पर ऑर्डर आने लगे। व्यवसाय बढ़ने के साथ उन्होंने समूह के बैंक सीसीएल (कैश क्रेडिट लिमिट) लिंकेज से ऋण लिया। इस फंड से दोना-पत्तल बनाने की मशीनरी, कच्चा माल और सेटअप लगाया। समय पर किस्तें चुकाकर उन्होंने अपनी वित्तीय साख मजबूत की। आज जूट बैग और दोना-पत्तल दोनों इकाइयों से इकाई का अनुमानित वार्षिक टर्नओवर आठ से दस लाख रुपये तक पहुंच चुका है।
30 हजार रुपये की प्रतिमाह हो रही शुद्ध बचत
कच्चे माल, बिजली और मजदूरी खर्च के बाद शीला दीदी को प्रतिमाह करीब 17 हजार से 25-30 हजार रुपये की शुद्ध बचत हो रही है। वार्षिक शुद्ध आय तीन लाख से तीन लाख साठ हजार रुपये के आसपास है। यह आंकड़े दिखाते हैं कि कैसे छोटे से शुरूआती सहयोग से एक ग्रामीण महिला बड़े स्तर पर उद्यम खड़ा कर सकती है।सबसे बड़ी बात रोजगार सृजन है। उत्पादन, कटिंग, सिलाई और पैकेजिंग में गांव की 40 से 50 महिलाएं प्रतिदिन सीधे काम करती हैं। क्षेत्र के 17 स्वयं सहायता समूहों की करीब 100 से 150 महिलाएं जूट बैग और दोना-पत्तल के काम से जुड़कर अतिरिक्त आय कमा रही हैं।
समूह ने पैसे ही नहीं दिए बल्कि आत्मविश्वास बढ़ा दिया
शीला दीदी कहती हैं कि समूह ने उन्हें सिर्फ पैसे नहीं दिए, बल्कि आत्मविश्वास और सही दिशा दी। योगी सरकार के प्रयासों से स्वयं सहायता समूहों का नेटवर्क प्रदेश के हर ब्लॉक तक फैला है। वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और बाजार लिंकेज के जरिए महिलाओं को उद्यमी बनाया जा रहा है। लखपति दीदी अभियान के तहत लाखों महिलाएं सालाना एक लाख रुपये या उससे अधिक आय अर्जित करने की राह पर हैं।शीला दीदी जैसी सफलताएं इस अभियान को मजबूती दे रही हैं।आज पूरा विकास खंड उन्हें सम्मान से ‘शीला दीदी समूह सखी’ कहकर बुलाता है। उन्होंने न सिर्फ अपने परिवार को आर्थिक मजबूती दी, बल्कि सैकड़ों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर समाज में बदलाव की नई मिसाल पेश की है।
सामूहिक बदलाव की गवाह हैं शीला
चारदीवारी से निकलकर शीला ने जो राह खोली है, वह कई और महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है। योगी सरकार का महिलाओं को सशक्त बनाने का संकल्प जब गांव-गांव तक पहुंचता है, तो शीला दीदी जैसी कहानियां लिखी जाती हैं, कहानियां जो सिर्फ व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि सामूहिक बदलाव की गवाह हैं।
















