जादूगोड़ा: साल के पत्तों में सजी मिठास, सड़क किनारे जीवित है ग्रामीण संस्कृति की पहचान

रिपोर्ट, सौरभ कुमार जादूगोड़ा

टाटा नरवा रोड से झरिया, भाटिन गांव, जादूगोड़ा साप्ताहिक हाट और टाटा शहर की ओर जाने वाले मार्ग पर इन दिनों ग्रामीण संस्कृति की एक खूबसूरत झलक राहगीरों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। सड़क किनारे ग्रामीण साल के पत्तों से बने छोटे-छोटे दोने में खजूर सजाकर बेचते नजर आते हैं। स्थानीय भाषा में इस दोने को “भागा” कहा जाता है।

ग्रामीणों द्वारा साल के पत्तों से तैयार किए गए एक भागा में निर्धारित मात्रा में खजूर रखे जाते हैं, जिसकी कीमत वर्तमान में ₹10 है। राहगीर रुककर बड़े उत्साह से इन खजूरों की खरीदारी करते हैं। यह केवल एक छोटा व्यापार नहीं, बल्कि गांव की पारंपरिक जीवनशैली और प्रकृति से जुड़ी संस्कृति की जीवंत पहचान बन चुका है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, एक समय इन रास्तों पर केंदु, जामुन, शरीफ़ा (मदाल), चारपाका समेत जंगलों से मिलने वाले कई पारंपरिक फल और वन उत्पाद भी इसी तरह पत्तों में सजाकर बेचे जाते थे। बदलते समय और आधुनिक बाजार व्यवस्था के बावजूद ग्रामीण इलाकों की यह सादगी आज भी लोगों को आकर्षित कर रही है।

प्लास्टिक और पैकेजिंग के बढ़ते दौर में साल के पत्तों में बिकते खजूर प्राकृतिक जीवनशैली और पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश दे रहे हैं। ग्रामीण विक्रेता सुबह से शाम तक सड़क किनारे बैठकर मेहनत करते हैं और इसी से अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं।

यात्रियों के लिए यह सिर्फ खजूर नहीं, बल्कि गांव की मिट्टी की खुशबू, परंपरा और पुराने दिनों की यादों का स्वाद है। यह दृश्य इस बात का प्रमाण है कि ग्रामीण संस्कृति आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। छोटे-छोटे प्रयासों के जरिए गांव के लोग अपनी पहचान और प्रकृति से जुड़ी परंपराओं को आज भी संजोए हुए हैं।

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